घर में क्लेश क्यों रहता है

सभी इंसानों के मन में एक सवाल रहता है कि अपने ईश्वर या आराध्य की पूजा करने का सबसे उपयुक्त समय कौन सा है। कुछ लोग कहते हैं कि जब समय मिले तभी कर लेना चाहिए। बात सिर्फ याद करने या सुमिरन करने की हो तब तो ठीक है जब आपको समय मिले तब अपने देवी या देवता का स्मरण कीजिए लेकिन पूजा पाठ पर क्या यह नियम लागू होगा ?  हम आप लोगों से पूछना चाहते हैं कि यदि आप किसी के यहाँ जाइये और बैठिए उसके बाद उस घर के लोग आपसे बात भी न करें (क्योंकि किसी के पास वक्त नहीं है) ,आपकी सेवा न करें (वो भी यही सोचें कि वक्त मिलेगा तो करेंगे) तो आपको कितना बुरा लगेगा ? सच पूछिए तो आप अपमानित महसूस करेंगे और दुबारा उस घर जाएंगे भी नहीं।उसी तरह यदि आपने मंदिर बनवाया है और उसमें अपने आराध्य, ईश्वर या देवी को स्थापित किया है तो आपका फर्ज है कि सबसे पहले उनकी सेवा ,उनका सत्कार हो उसके बाद अन्य कार्य किए जाएं।

हमने बहुत सारे लोगों को देखा है यहां तक कि हमारे माता पिता भी सुबह होते ही अपने कार्यों में लग जाते हैं । पशुओं का चारा इकठ्ठा करने मे, खेती बाडी का काम करने में और जब सारा काम हो जाता है तो 11 बजे या 12 बजे आएंगे और नहाएंगे फिर पूजा पाठ करेंगे। कभी कभी मैं सोचता हूँ कि क्या ईश्वर या देवीजी सुबह की पूजा (जो हो जानी चाहिए थी) ,दोपहर में खुश होकर ग्रहण करती होंगी?  नहीं बिल्कुल नहीं आपकी पूजा व्यर्थ चली गई और आप कहते हो कि हम इतना पूजा अर्चना करते हैं हमें उसका फल नहीं मिलता हम परेशान रहते हैं। अरे जो चीज व्यर्थ चली गई उसकी क्या उपयोगिता। आप हमें बताइए कि अगर आपको सुबह का भोजन दोपहर में दिया जाए तो क्या आपको गुस्सा नहीं आएगा।

अगर इन लोगों से यह कहा जाए कि आप सुबह उठकर नहाधोकर सबसे पहले अपने ईश्वर या देवीजी को नहला धुलाकर उनकी सेवा या पूजा पाठ कर लीजिए उसके बाद , खुद भी नाश्ता करके फिर अपने काम पर जाइए तो इनका अलग ही ज्ञान शुरू हो जाता है कि धूप हो जाएगी धूप में कौन जाएगा काम करने , इसलिए पहले काम निपटा लो फिर पूजा पाठ होता रहेगा। इनको अपनी तकलीफ की ज्यादा पडी रहती है , काम होने न होने की ज्यादा टेंशन रहती है लेकिन उसकी फिकर नहीं रहती जिसको मंदिर में लाकर बैठाए हैं और उससे इंतजार करवा रहे हैं कि कब मेरे भक्त का काम पूरा हो और वो आकर मुझे नहलाए और मेरी पूजा करे। भाई साहब जब आप अपने मन का करेंगे तो आप ईश्वर या देवीजी से कैसे उम्मीद कर रहे हैं कि वो आपके मन का करें, वो भी अपने मन का करेंगी। आप ईश्वर के मन का कीजिए फिर ईश्वर आपके मन की न करे तो कहिएगा। हम तो यही कहेंगे यदि पूजा पाठ के शौकीन हैं आस्था रखते हैं तो ढंग से कीजिए , विश्वास से कीजिए, सब कुछ समर्पित करके कीजिए अन्यथा देवीजी या ईश्वर की विदाई करके मंदिर तुडवा दीजिए, फिर कीजिए जितना काम करना हो।

याद रखिए ईश्वर का अपमान करने वालों के घर में कभी सुख शांति नहीं रहती है हमेशा कोई न कोई क्लेश चलता रहता है। घर में शांति चाहिए तो खुद का मन भी शांत होना चाहिए। मन शांत होगा तभी कोई काम सुसंगठित तरीक़े से हो पाएगा। अशांत मन वाला इंसान अस्थिर होता है और वो किसी भी काम को करने की योजना नहीं बना पाता और जब बिना योजना के कोई काम होगा तो वो पूरा नहीं होगा और फिर वह इंसान घरवालों पर गुस्सा करेगा गाली गलौज करना शुरू कर देगा। एक बार जिसके मुंह से गाली निकलना शुरू हुई तो उसको न माँ दिखेगी न बेटी न बहू। यह वह समय होता है जब घर की स्थिति परिस्थिति पर से उसका कंट्रोल जा  रहा होता है लोग उसकी बातों को हलके में लेना शुरू कर देते हैं, और उसे लगता है कि उसकी इज्जत नहीं होती घर मे। इज्जत होगी भी कैसे जब इंसान के मुंह से अपने ही घर के सदस्यों के लिए गालियां निकलनी शुरू हो जाती है तो वह इंसान इज्जत का हकदार ही नहीं होता है और उल्टा कहता फिरता है कि घर में लोग उसकी इज्जत नहीं करते।

दोस्तों यदि घर सही तरीक़े से चलाना हो तो घर के बडों की (खासकर जो मालिक है घर के) जिम्मेदारी बढ जाती है। घर का मालिक होना आसान काम नहीं होता है। अगर घर मालिक सही नहीं है तो घर का बण्टाधार ही समझो। आप घर के मालिक हो तो घर के सदस्यों की जरूरतों का भी ज्ञान रखना होगा और नहीं है तो सदस्यों से कम्युनिकेशन जारी रखना होगा ताकि वो कह सके कि उन्हें किस चीज की जरूरत है। परिवार चलाने की सबसे महत्वपूर्ण चाबी सिर्फ एक ही है वो है मधुर वाणी। परिवार के सदस्य कुछ भी बोले कितना भी कडवा ,पर घर के मालिक को मधुर ही बोलना पडेगा यह शर्त है घर को एकसूत्र में बांधकर रखने की। यदि आपने मालिक होकर किसी का पक्ष लिया और किसी का विरोध किया तो घर नहीं चल पाएगा।

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