इतिहास गवाह रहा है कि उच्च जातियों ने हमेशा से ही निम्न जातियों का शोषण किया है चाहे सामाजिक रूप से हो या आर्थिक रूप से। आज हम एक ऐसी शोषण की कहानी लेकर आए हैं जिसके बारे में जानकर किसी भी सभ्य समाज के इंसान का खून खौल जाएगा। पुराने समय में भारत के कुछ हिस्सों में, खासकर केरल के त्रावणकोर रियासत में, 18वीं और 19वीं सदी के दौरान एक ऐसी प्रथा थी जिसे “मुलक्करम” या “स्तन कर” कहा जाता था। यह कर मुख्य रूप से निचली जातियों, जिनमें शूद्र और दलित समुदाय की महिलाएं शामिल थीं, पर लागू किया जाता था। इस प्रथा के तहत इन महिलाओं को अपने स्तनों को ढकने की अनुमति नहीं थी, और यदि वे ऐसा करना चाहती थीं, तो उन्हें इसके लिए कर चुकाना पड़ता था।यह प्रथा त्रावणकोर के राजवंश द्वारा लागू की गई थी, जो उस समय की जाति व्यवस्था को बनाए रखने और निचली जातियों को अपमानित करने का एक तरीका थी। इस कर को ऊँची जातियों, जैसे नायर और नंबूदरी ब्राह्मणों, के अधिकारियों द्वारा वसूला जाता था। इसका उद्देश्य सामाजिक भेदभाव को कायम रखना था, ताकि जाति के आधार पर लोगों की पहचान आसानी से हो सके। कुछ ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, यह कर महिलाओं के स्तनों के आकार के आधार पर भी निर्धारित किया जाता था, जो इसे और भी अपमानजनक बनाता था।इस प्रथा के खिलाफ नंगेली नाम की एक दलित महिला का विद्रोह प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि उसने इस कर का विरोध करने के लिए अपने स्तनों को काटकर अधिकारियों के सामने प्रस्तुत कर दिया था, जिसके बाद अत्यधिक रक्तस्राव से उसकी मृत्यु हो गई। इस घटना ने व्यापक आक्रोश पैदा किया और यह प्रथा समाप्त हुई। इसके अलावा, चन्नार विद्रोह (Channar Revolt) जैसे आंदोलनों ने भी 19वीं सदी में इस प्रथा को खत्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1859 में त्रावणकोर के राजा को मजबूरन यह घोषणा करनी पड़ी कि निचली जाति की महिलाएं बिना कर चुकाए अपने शरीर को ढक सकती हैं।हालांकि, कुछ इतिहासकारों का मानना है कि “स्तन कर” की कहानी को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया हो सकता है, और यह मूल रूप से एक सामान्य कर था जो बाद में इस तरह की व्याख्या से जोड़ा गया। फिर भी, यह निर्विवाद है कि उस समय निचली जाति की महिलाओं पर कपड़े पहनने को लेकर कड़े प्रतिबंध थे, और यह प्रथा सामाजिक अन्याय का एक हिस्सा थी।इसलिए, यह कहना सही है कि यह प्रथा वास्तव में मौजूद थी, और यह उस समय की क्रूर जातिगत व्यवस्था का एक उदाहरण थी।
नंगेली का विद्रोह भारतीय इतिहास में सामाजिक अन्याय और जातिगत उत्पीड़न के खिलाफ एक साहसी प्रतिरोध का प्रतीक है। यह घटना 19वीं सदी की शुरुआत में केरल के त्रावणकोर रियासत में घटी थी, जहां “मुलक्करम” या “स्तन कर” (Breast Tax) जैसी अपमानजनक प्रथा प्रचलित थी। नंगेली एक दलित महिला थीं, जो एझावा समुदाय से ताल्लुक रखती थीं, और उन्होंने इस प्रथा के खिलाफ एक असाधारण कदम उठाया, जिसने न केवल उस समय के समाज को झकझोर दिया, बल्कि बाद में सामाजिक सुधारों का मार्ग भी प्रशस्त किया। आइए नंगेली की कहानी आपको बताते है जो कई स्रोतों से हमें प्राप्त हुई है। नंगेली चेरथला (अलप्पुझा जिला, केरल) के पास एक गाँव में रहती थीं। उस समय त्रावणकोर में निचली जातियों की महिलाओं को अपने ऊपरी शरीर को ढकने की अनुमति नहीं थी, और यदि वे ऐसा करना चाहती थीं, तो उन्हें “मुलक्करम” नामक कर देना पड़ता था। यह कर न केवल आर्थिक बोझ था, बल्कि महिलाओं के सम्मान और स्वाभिमान पर भी हमला था। नंगेली के लिए यह प्रथा असहनीय थी, क्योंकि यह उनकी गरिमा को ठेस पहुँचाती थी। उस समय स्थिति ऐसी थी कि यदि नायर वर्ग की महिलाओं ने कपड़े से सीना ढका तो उसकी सूचना राजपुरोहित तक पहुंच जाती थी। पुरोहित एक लंबी लाठी लेकर चलता था जिसके सिरे पर एक चाकू बंधी होती थी। वह उसी से ब्लाउज खींचकर फाड़ देता था। उस कपड़े को वह पेड़ों पर टांग देता था। यह संदेश देने का एक तरीका था कि आगे कोई ऐसी हिम्मत न कर सके। वास्तव में यह एक घिनौना कृत्य था जो उस वक्त के ब्राह्मणों द्वारा किया जाता था। इन सब चीजों को जानने के बाद भी आज के समय में कोई ‘पूजहिं विप्र सकल गुण हीना ‘ का अर्थ बताता है कि ब्राह्मण गुणहीन होने पर भी पूज्यनीय है तो हमारा तो गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच जाता है। खैर आगे की कहानी जानते हैं, एक दिन, जब कर वसूलने वाले अधिकारी (प्रवरथियार) उनके घर आए और उनसे मुलक्करम की मांग की, तो नंगेली ने इसका विरोध करने का फैसला किया। उन्होंने कर चुकाने से इनकार कर दिया लेकिन जब पुरोहित और अधिकारी जिद पर अड गए कि कर दो या फिर अपनी छाती से कपड़े हटाओ। इससे भी शर्मनाक यह हुआ कि उन्होंने कहा, अपनी छाती से कपडा हटाओ हम स्तन का वजन आकार देखकर कर का मूल्य तय करेंगे। अर्थात हर हाल में नंगेली कपडा हटाना ही था। इसके नंगेली घर के अन्दर गई और एक चौंकाने वाला कदम उठाया। कहा जाता है कि नंगेली ने एक तेज हथियार से अपने दोनों स्तनों को काट लिया और उन्हें केले के पत्ते पर रखकर अधिकारियों के सामने पेश कर दिया। इस भयानक विरोध के बाद अत्यधिक रक्तस्राव के कारण उनकी मृत्यु हो गई। उनके पति, जिनका नाम चिरुकंदन था, ने भी अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद आत्मदाह कर लिया। नंगेली की यह बलिदानी कार्रवाई उस समय के समाज में एक बड़े आंदोलन का कारण बनी। उनकी मृत्यु ने लोगों में आक्रोश पैदा किया और इस प्रथा के खिलाफ आवाज़ उठाने की हिम्मत दी। इस घटना को चन्नार विद्रोह (Channar Revolt) से भी जोड़ा जाता है, जो 1800 के दशक में निचली जाति की महिलाओं द्वारा अपने शरीर को ढकने के अधिकार के लिए लड़ा गया एक व्यापक आंदोलन था। नंगेली का बलिदान इस आंदोलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। 1859 में त्रावणकोर के राजा ने अंततः हार मान ली और यह घोषणा की कि निचली जाति की महिलाएं बिना कर चुकाए अपने शरीर को ढक सकती हैं। नंगेली का वह विद्रोह आज भी जातिगत और लैंगिक उत्पीड़न के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक है। उनकी कहानी केरल में सामाजिक सुधार आंदोलनों और नारीवादी विचारधारा के लिए प्रेरणा बनी। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि नंगेली की कहानी में कुछ अतिशयोक्ति हो सकती है, क्योंकि इसके लिखित प्रमाण सीमित हैं और यह मुख्य रूप से मौखिक परंपराओं के माध्यम से प्रसारित हुई है। यह भी हो सकता है कि उच्च जाति के लोगों द्वारा इस घटना को दबाने का प्रयास किया गया हो ताकि दलितों के प्रति उनकी यह क्रूरता भविष्य के समाज को पता न चले । लिखित रूप यह घटना ज्यादा नहीं मिलती क्योंकि जो लिखने वाले थे वो उच्च जातियों के थे तो जाहिर सी बात है कि अपनी जाति के बुरे कर्म कोई क्यों लिखेगा और छोटी जातियों के लोग शिक्षित नहीं थे। फिर भी मौखिक रूप से इस घटना को जितना आगे बढ़ाया जा सका , बढ़ाया गया। अब, यह व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि यह घटना वास्तविक थी और इसने उस समय के सामाजिक ढांचे पर गहरा प्रभाव डाला। कुछ विद्वानों का कहना है कि “मुलक्करम” शब्द का अर्थ मूल रूप से एक सामान्य कर था, जो बाद में इस विशेष प्रथा से जोड़ा गया।नंगेली को आज केरल में एक नायिका के रूप में याद किया जाता है। उनके सम्मान में कई लेख, कविताएँ, और यहाँ तक कि कला प्रदर्शनियाँ भी बनाई गई हैं।उनकी कहानी आधुनिक भारत में जाति और लिंग आधारित भेदभाव के खिलाफ जागरूकता बढ़ाने के लिए भी इस्तेमाल की जाती है।नंगेली का विद्रोह न केवल एक व्यक्तिगत बलिदान था, बल्कि यह उस समय की क्रूर प्रथाओं के खिलाफ एक सामूहिक चेतना को जागृत करने वाला कदम था। उनकी कहानी हमें याद दिलाती है कि स्वतंत्रता और सम्मान के लिए संघर्ष कितना कठिन और दर्दनाक हो सकता है।