सम्पूर्ण चोल वंश विस्तार से

चोल साम्राज्य प्राचीन भारत के सबसे शक्तिशाली और लंबे समय तक शासन करने वाले राजवंशों में से एक था। इस राजवंश ने 9वीं शताब्दी से 13वीं शताब्दी ईस्वी तक दक्षिण भारत और पड़ोसी क्षेत्रों में एक विशाल हिंदू साम्राज्य का निर्माण किया।

 * विजयालय (850-871 ई.) चोल साम्राज्य के संस्थापक माने जाते हैं। उन्होंने पल्लवों की अधीनता से निकलकर तंजावुर पर कब्जा कर लिया और एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की।विजयालय को चोल साम्राज्य का संस्थापक माना जाता है। उन्होंने 9वीं शताब्दी के मध्य में (लगभग 850 ई.) इस वंश का पुनरुत्थान किया। विजयालय से पहले, चोल पल्लवों के सामंत थे। विजयालय ने अपनी राजनीतिक सूझबूझ का परिचय देते हुए पल्लवों और पांड्यों के बीच चल रहे संघर्ष का लाभ उठाया। उन्होंने तंजावुर (तंजौर) पर विजय प्राप्त की, जो उस समय पांड्यों के अधीन था। इस विजय के बाद, उन्होंने अपनी राजधानी उरैयूर से तंजावुर स्थानांतरित कर दी, जिसने चोलों के साम्राज्य का केंद्र बनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अपनी जीत के उपलक्ष्य में, विजयालय ने “नरकेसरी” की उपाधि धारण की। उन्होंने तंजावुर में निशुंभसूदिनी (देवी दुर्गा का एक रूप) का एक मंदिर भी बनवाया, जो उनकी धार्मिक आस्था को दर्शाता है। विजयालय के बाद उनके पुत्र आदित्य प्रथम ने शासन संभाला और चोल साम्राज्य का विस्तार जारी रखा।

 * आदित्य प्रथम (871-907 ई.): इन्होंने पल्लवों को पूरी तरह से पराजित करके उनके राज्य को अपने साम्राज्य में मिला लिया। आदित्य प्रथम (लगभग 871-907 ई.) चोल साम्राज्य के एक महत्वपूर्ण शासक थे। वह संस्थापक विजयालय के पुत्र और उत्तराधिकारी थे। उनके शासनकाल को चोलों के विस्तार और शक्ति के सुदृढ़ीकरण का काल माना जाता है।

मुख्य उपलब्धियाँ: पल्लवों पर विजय: आदित्य प्रथम ने पल्लव शासक अपराजितवर्मन को हराकर तोंडमंडलम् (पल्लवों का क्षेत्र) को अपने राज्य में मिला लिया। इस विजय ने चोलों को एक शक्तिशाली साम्राज्य के रूप में स्थापित किया और पल्लव राजवंश का अंत कर दिया।

* पश्चिमी गंगों पर प्रभुत्व: उन्होंने पश्चिमी गंगों पर भी अपना अधिकार स्थापित किया, जिससे चोल साम्राज्य का विस्तार और भी अधिक हुआ।

 * कोंगु नाडु की विजय: आदित्य प्रथम ने पांड्य शासक परान्तक वीरानारायणन से कोंगु नाडु को भी जीत लिया, जिससे चोलों का प्रभाव दक्षिण भारत के एक बड़े क्षेत्र में फैल गया।

 * शैविक आस्था: वे भगवान शिव के एक महान भक्त थे। उन्होंने कावेरी नदी के किनारे अनेक शिव मंदिरों का निर्माण करवाया।

आदित्य प्रथम के शासनकाल में चोलों ने न केवल अपनी स्वतंत्रता को मजबूत किया, बल्कि एक बड़े साम्राज्य की नींव भी रखी, जिस पर बाद के महान शासकों, जैसे राजराज प्रथम और राजेंद्र प्रथम, ने विशाल साम्राज्य का निर्माण किया।

 * राजराज प्रथम (985-1014 ई.): इन्हें चोल साम्राज्य का सबसे महान शासक माना जाता है। इन्होंने श्रीलंका के उत्तरी भाग पर विजय प्राप्त की, मालदीव द्वीपों पर अधिकार किया और एक शक्तिशाली नौसेना का निर्माण किया। तंजावुर में प्रसिद्ध बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण इन्हीं के शासनकाल में हुआ था।चोल सम्राट राजराज प्रथम (लगभग 985-1014 ई.) चोल साम्राज्य के सबसे महान शासकों में से एक थे। उन्होंने अपने पिता उत्तम चोल के बाद सिंहासन संभाला और अपने 30 वर्षों के शासनकाल में चोल साम्राज्य को एक विशाल और शक्तिशाली साम्राज्य में बदल दिया।

प्रमुख उपलब्धियाँ और विजय:

 * विस्तृत साम्राज्य: राजराज प्रथम ने कई नौसैनिक और सैन्य अभियान चलाए। उन्होंने दक्षिण में केरल और पांड्य शासकों को हराया, श्रीलंका के उत्तरी भाग पर कब्जा किया और मालाबार तट व मालदीव द्वीपों को भी अपने अधीन कर लिया। उनके शासनकाल में चोलों का साम्राज्य उत्तर में कलिंग तक फैला हुआ था।

 * प्रशासनिक सुधार: वह एक कुशल प्रशासक भी थे। उन्होंने भू-राजस्व निर्धारित करने के लिए भूमि का व्यापक सर्वेक्षण कराया और स्थानीय स्वशासन को बढ़ावा दिया, जो चोल प्रशासन की एक प्रमुख विशेषता थी।

* कला और वास्तुकला: राजराज प्रथम कला और वास्तुकला के महान संरक्षक थे। उन्होंने तंजावुर में बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया, जिसे राजराजेश्वर मंदिर भी कहा जाता है। यह मंदिर द्रविड़ वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है और यूनेस्को की विश्व धरोहरों में शामिल है।

 * धार्मिक सहिष्णुता: वह स्वयं एक शैव भक्त थे और उन्होंने ‘शिवपादशेखर’ की उपाधि धारण की, लेकिन वे अन्य धर्मों के प्रति भी सहिष्णु थे। उन्होंने बौद्ध धर्म के अनुयायियों को भी संरक्षण दिया।

इन सभी उपलब्धियों ने राजराज प्रथम को एक महान विजेता, कुशल प्रशासक और निर्माता के रूप में स्थापित किया, और उनके बाद उनके पुत्र राजेंद्र प्रथम ने इस साम्राज्य को और भी ऊंचाइयों पर पहुँचाया।

 * राजेंद्र प्रथम (1014-1044 ई.): ये राजराज प्रथम के पुत्र थे और इन्होंने अपने पिता के साम्राज्य का और भी अधिक विस्तार किया। इन्होंने कलिंग को जीतकर बंगाल तक अपना प्रभाव फैलाया और गंगा नदी तक विजय अभियान चलाया, जिसके बाद उन्होंने गंगईकोंडा चोलपुरम नामक नई राजधानी बसाई। उन्होंने दक्षिण-पूर्व एशिया के श्रीविजय साम्राज्य पर भी आक्रमण किया।चोल सम्राट राजेंद्र प्रथम (1014-1044 ई.) चोल राजवंश के सबसे महान शासकों में से एक थे और राजराज प्रथम के पुत्र तथा उत्तराधिकारी थे। उन्होंने अपने पिता के विशाल साम्राज्य को और भी अधिक विस्तृत किया और इसे दक्षिण भारत का सबसे शक्तिशाली साम्राज्य बनाया।

प्रमुख उपलब्धियाँ और सैन्य अभियान:

* गंगा घाटी पर विजय: राजेंद्र प्रथम का सबसे प्रसिद्ध अभियान गंगा नदी के किनारे तक था। उन्होंने उत्तरी भारत में पाल वंश के शासक महिपाल को पराजित किया। इस विजय के उपलक्ष्य में, उन्होंने गंगईकोंडा चोल (गंगा को जीतने वाला चोल) की उपाधि धारण की।

 * नई राजधानी: गंगा अभियान की सफलता के बाद, उन्होंने अपनी नई राजधानी गंगईकोंडा चोलपुरम (गंगा को जीतने वाले चोल का शहर) का निर्माण कराया। यहाँ उन्होंने तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर की तरह ही एक और भव्य शिव मंदिर का निर्माण भी कराया।

 * दक्षिण-पूर्व एशिया पर नौसैनिक विजय: राजेंद्र प्रथम की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धि श्रीविजय साम्राज्य (आज के मलेशिया और इंडोनेशिया) पर उनका सफल नौसैनिक अभियान था। उन्होंने एक शक्तिशाली नौसेना के बल पर इस साम्राज्य को हराया और मलक्का जलडमरूमध्य पर नियंत्रण स्थापित किया, जिससे चोलों का समुद्री व्यापार पर दबदबा बढ़ गया।

 * श्रीलंका और अन्य क्षेत्रों पर नियंत्रण: उन्होंने अपने पिता के अधूरे काम को पूरा करते हुए पूरे श्रीलंका पर विजय प्राप्त की और वहाँ के शासक महेंद्र पंचम को बंदी बना लिया। उन्होंने पश्चिमी चालुक्यों और पांड्यों को भी पराजित कर अपने साम्राज्य का विस्तार किया।

राजेंद्र प्रथम का शासनकाल चोल साम्राज्य के गौरव का शिखर था। उनकी सैन्य सफलताओं ने चोलों को एक क्षेत्रीय शक्ति से एक अंतरराष्ट्रीय शक्ति में बदल दिया।

कुलोत्तुंग प्रथम (1070-1122 ई.) चोल राजवंश के एक महान और महत्वपूर्ण शासक थे। उनका शासनकाल चोल इतिहास में एक नए युग की शुरुआत का प्रतीक है, क्योंकि उन्होंने चोल और पूर्वी चालुक्य राजवंशों को एक साथ मिला दिया था।

प्रमुख जानकारी और उपलब्धियाँ:

* उत्तराधिकार: कुलोत्तुंग प्रथम चोल सम्राट राजेंद्र प्रथम की बेटी अम्मंगादेवी और वेंगी के पूर्वी चालुक्य राजा राजराजा नरेंद्र के पुत्र थे। उनके सिंहासन पर बैठने के बाद चोल राजवंश की मध्य शाखा समाप्त हो गई और चालुक्य-चोल वंश की शुरुआत हुई।

 * शांति और समृद्धि: उन्होंने अनावश्यक युद्धों से बचने की नीति अपनाई, जिससे उनका अधिकांश शासनकाल शांति और समृद्धि का काल रहा। उन्होंने साम्राज्य की आर्थिक स्थिति को सुधारने पर विशेष ध्यान दिया।

 * प्रशासनिक और आर्थिक सुधार: उन्होंने भू-राजस्व के निर्धारण के लिए भूमि का पुनः सर्वेक्षण कराया। व्यापार को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने चुंगी और तटकर जैसे कई करों को समाप्त कर दिया, जिसके कारण उन्हें ‘सुंगम तविर्त्त चोल’ (कर हटाने वाला चोल) की उपाधि मिली।

 * विदेशी संबंध: कुलोत्तुंग प्रथम ने चीन सहित दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के साथ व्यापारिक संबंध बनाए रखे। 1077 ईस्वी में, उन्होंने 72 व्यापारियों का एक दूत मंडल चीन भेजा था।

* सैन्य अभियान: उन्होंने पश्चिमी चालुक्यों को पराजित कर चोलों के वर्चस्व को बनाए रखा। उन्होंने पांड्य और केरल के विद्रोहों को भी दबाया। यद्यपि उनके शासनकाल में श्रीलंका का कुछ हिस्सा चोल साम्राज्य से स्वतंत्र हो गया था, फिर भी वे अपने अधिकांश क्षेत्रों पर नियंत्रण बनाए रखने में सफल रहे।

कुल मिलाकर, कुलोत्तुंग प्रथम ने चोल साम्राज्य को स्थिरता और आर्थिक समृद्धि प्रदान की, जिससे वे एक कुशल प्रशासक और दूरदर्शी शासक के रूप में जाने जाते हैं।

कुलोत्तुंग प्रथम के बाद कई शासकों ने चोल साम्राज्य पर शासन किया, लेकिन उनकी शक्ति और प्रभाव धीरे-धीरे कम होता गया। कुलोत्तुंग प्रथम के बाद के प्रमुख राजाओं का क्रम इस प्रकार है:

 * विक्रम चोल (1118-1135 ई.): कुलोत्तुंग प्रथम के पुत्र थे। उनके शासनकाल में चोलों को पश्चिमी चालुक्यों और होयसलों से लगातार संघर्ष करना पड़ा, जिससे साम्राज्य की सीमाएँ संकुचित होने लगीं।

 * कुलोत्तुंग द्वितीय (1135-1150 ई.): विक्रम चोल के पुत्र थे। उनका शासनकाल शांतिपूर्ण रहा और उन्होंने कला तथा साहित्य को संरक्षण दिया, लेकिन इस दौरान साम्राज्य की राजनीतिक और सैन्य शक्ति में गिरावट जारी रही।

* राजराज द्वितीय (1150-1173 ई.): कुलोत्तुंग द्वितीय के बाद राजा बने। उनके शासनकाल में आंतरिक विद्रोहों और पड़ोसी राज्यों के बढ़ते प्रभाव ने चोलों को कमजोर किया।

* राजाधिराज द्वितीय (1173-1179 ई.): इनके शासनकाल में पांड्यों के आंतरिक मामलों में चोलों का हस्तक्षेप बढ़ गया, जिससे पांड्यों और चोलों के बीच संघर्ष और तेज हो गया।

* कुलोत्तुंग तृतीय (1179-1218 ई.): इन्हें बाद के चोल शासकों में सबसे शक्तिशाली माना जाता है। उन्होंने पांड्यों, चेरों और होयसलों को कई बार पराजित किया और कुछ समय के लिए चोलों की खोई हुई प्रतिष्ठा को बहाल करने का प्रयास किया।

 * राजराज तृतीय (1218-1246 ई.): उनके शासनकाल से चोल साम्राज्य का पतन स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा। पांड्य शासक मारवर्मन सुंदर पांड्य ने उन्हें कई बार हराया।

 * राजेंद्र तृतीय (1246-1279 ई.): चोल साम्राज्य के अंतिम ज्ञात शासक थे। उनके शासनकाल में पांड्य शासक मारवर्मन कुलशेखर पांडियन ने उन्हें निर्णायक रूप से हराया, जिससे चोलों का शासन समाप्त हो गया और पांड्य साम्राज्य का उदय हुआ।

इस प्रकार, कुलोत्तुंग प्रथम के बाद के शासक लगातार आंतरिक संघर्षों और बाहरी हमलों से जूझते रहे, जिसके कारण अंततः 13वीं शताब्दी के अंत तक चोल साम्राज्य का पतन हो गया।

चोलों की प्रशासनिक व्यवस्था:

चोल प्रशासन अपनी सुव्यवस्थित संरचना और विशेष रूप से स्थानीय स्वशासन के लिए प्रसिद्ध था।

 * केंद्रीय प्रशासन: राजा राज्य का सर्वोच्च अधिकारी होता था, जिसकी सहायता के लिए मंत्री और अन्य उच्च अधिकारी होते थे।

 * स्थानीय स्वशासन: चोल साम्राज्य की सबसे अनूठी विशेषता ग्राम स्तर पर स्वायत्तता थी। गाँवों को तीन सभाओं में बांटा गया था:

 * उर (Ur): यह गाँव की एक सामान्य सभा थी जिसमें सभी कर देने वाले निवासी शामिल होते थे।

   * सभा या महासभा (Sabha or Mahasabha): यह ब्राह्मणों के गाँव की सभा थी और इसे विशेष स्वायत्तता प्राप्त थी।

   * नगरम (Nagaram): यह व्यापारियों और कारीगरों की सभा थी।

 * कर व्यवस्था: भूमि कर आय का मुख्य स्रोत था। इसके अलावा, व्यवसाय कर, चुंगी कर, आयात कर और अन्य कर भी लगाए जाते थे।

चोलों की कला और स्थापत्य कला :

चोल शासक कला और स्थापत्य कला के महान संरक्षक थे। उनके शासनकाल में द्रविड़ शैली के मंदिरों का अभूतपूर्व विकास हुआ।

 * मंदिर: चोल मंदिरों की प्रमुख विशेषताएँ विशाल विमान (मंदिर के ऊपर का पिरामिडनुमा शिखर) और ऊँची चारदीवारी थीं। राजराज प्रथम द्वारा बनवाया गया तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर और राजेंद्र प्रथम द्वारा बनवाया गया गंगईकोंडा चोलपुरम का मंदिर इस शैली के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

 * मूर्तिकला: चोल काल की कांस्य मूर्तियाँ, विशेष रूप से नटराज शिव की मूर्तियाँ, अपनी कलात्मक सुंदरता और जीवंतता के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं।

 * चित्रकला: मंदिरों की दीवारों पर चोल कालीन भित्तिचित्र भी पाए गए हैं, जिनमें धार्मिक और पौराणिक दृश्यों का चित्रण है।

आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था

 * कृषि: चोलों ने सिंचाई व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया, जिससे कृषि समृद्ध हुई। कावेरी जैसी नदियों का उपयोग सिंचाई के लिए किया जाता था।

 * व्यापार: चोलों के पास एक शक्तिशाली नौसेना थी, जिसने उन्हें बंगाल की खाड़ी पर नियंत्रण करने में मदद की। इससे दक्षिण-पूर्व एशिया, चीन और अरब देशों के साथ समुद्री व्यापार फला-फूला।

 * समाज: समाज कठोर जाति व्यवस्था पर आधारित था, जिसमें ब्राह्मणों और क्षत्रियों को उच्च स्थान प्राप्त था। चोल शासक शैव धर्म के अनुयायी थे और उन्होंने मंदिरों के निर्माण और धार्मिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया।

चोल साम्राज्य का पतन कैसे हुआ?

चोल साम्राज्य का पतन कई आंतरिक और बाहरी कारणों से हुआ, जो 12वीं शताब्दी के अंत से शुरू होकर 13वीं शताब्दी में पूरी तरह से समाप्त हो गया। साम्राज्य के पतन के मुख्य कारण इस प्रकार हैं:

आंतरिक कारण:

 * कमजोर शासक: राजेंद्र प्रथम के बाद के शासक उतने सक्षम नहीं थे। उनके उत्तराधिकारियों को राष्ट्रकूटों और अन्य प्रतिद्वंद्वियों से लगातार संघर्ष करना पड़ा, जिससे साम्राज्य कमजोर होता चला गया।

 * आंतरिक कलह: शासक परिवारों में सत्ता के लिए संघर्ष और विद्रोह होते रहे, जिससे साम्राज्य की केंद्रीय शक्ति कमजोर हुई।

बाहरी कारण:

 * पांड्यों का उदय: 13वीं शताब्दी में पांड्य शासक शक्तिशाली होकर उभरे। पांड्य राजा मारवर्मन कुलशेखर पांडियन प्रथम ने अंतिम चोल सम्राट राजेंद्र तृतीय (1246-1279 ई.) को हराया, जिससे चोल साम्राज्य का अंत हो गया।

* अन्य शक्तियों का उदय: होयसल और काकतीय जैसे राजवंशों ने भी चोलों के कमजोर होते ही उनके क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू कर दिया। 1216 ईस्वी में, होयसल राजाओं ने चोल इलाकों में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया, जिससे उनकी शक्ति और भी कमजोर हो गई।

* मुस्लिम आक्रमण: 14वीं शताब्दी की शुरुआत में, दिल्ली सल्तनत के अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति मलिक काफूर ने दक्षिण भारत पर आक्रमण किया। इन आक्रमणों ने दक्षिण भारत की राजनीतिक व्यवस्था को पूरी तरह से बदल दिया और चोल साम्राज्य के बचे हुए प्रभाव को भी समाप्त कर दिया।

चोल साम्राज्य का अंत 1279 ईस्वी में हुआ, जब पांड्यों ने अंतिम चोल शासक राजेंद्र तृतीय को हराया और उसके बाद दक्षिण में उनका वर्चस्व समाप्त हो गया।

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