सबसे पहले तो जान लीजिए कि लगान क्या है? सामान्य रूप से कहें तो लगान या Rent शब्द का प्रयोग, भूमि के उपयोग के लिए दिए गए प्रतिफल के लिए किया जाता है जो उसका (भूमि) प्रयोग करने वाला उस वस्तु या भूमि के मालिक को देता है। इस तरह आप कह सकते हैं कि दुकान, मकान,खान आदि के प्रयोग के बदले में मिलने वाला मूल्य भी लगान के अंतर्गत आएगा लेकिन अर्थशास्त्र में लगान से अभिप्राय भूमि के प्रयोग से प्राप्त मूल्य से है। भूमि के अर्थ के सम्बन्ध में क्लासिकल अर्थशास्त्रियों और आधुनिक अर्थशास्त्रियों में मतभेद है इसीलिए भूमि से प्राप्त प्रतिफल लगान के दो सिद्धांत मिलते हैं। (१)लगान का क्लासिकल सिद्धांत या रिकार्डों का लगान सिद्धांत (२) लगान का आधुनिक सिद्धांत (मार्शल आदि)। मार्शल ने कहा, भूमि से तात्पर्य उन सब पदार्थों तथा शक्तियों से है जो प्रकृति मनुष्य की सहायता के लिए,भूमि, पानी, हवा तथा गर्मी के रूप में नि: शुल्क प्रदान करती है। ‘ इसीलिए मार्शल ने लगान की परिभाषा इस प्रकार दी है, “लगान वह आय है जो भूमि तथा प्रकृति के नि:शुल्क उपहारों के स्वामी को प्राप्त होता है।”
रिकार्डों के अनुसार, “लगान भूमि की उपज का वह भाग है जो भूमि के स्वामी को मिट्टी की मौलिक तथा अविनाशी शक्तियों के प्रयोग के बदले दिया जाता है।” आइए अब रिकार्डों के लगान सिद्धांत की व्याख्या करते हैं जो कि क्लासिकल अर्थशास्त्री हैं।
रिकार्डों का लगान सिद्धांत (Ricardo’s Theory of Rent) अर्थशास्त्र में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है, जिसे ब्रिटिश अर्थशास्त्री डेविड रिकार्डो ने 19वीं सदी में प्रतिपादित किया था। यह सिद्धांत मुख्य रूप से भूमि के लगान (Rent) की उत्पत्ति और इसके निर्धारण की प्रक्रिया को समझाता है। इसे समझने के लिए हमें इसके मूल आधार, तर्क और निहितार्थों को विस्तार से देखना होगा।मूल आधार की बात करें तो रिकार्डो का लगान सिद्धांत इस धारणा पर टिका है कि:
भूमि की आपूर्ति सीमित और स्थिर है: भूमि एक प्राकृतिक संसाधन है, जिसकी मात्रा बढ़ाई नहीं जा सकती। इस मान्यता के अनुसार भूमि की लोच पूर्णतया बेलोचदार है।
भूमि की उर्वरता में अंतर: सभी जमीनें समान रूप से उर्वर नहीं होतीं। कुछ जमीनें अधिक उपजाऊ होती हैं, जबकि कुछ कम।
उत्पादन में क्रमागत उत्पादन ह्रास नियम लागू है (Law of Diminishing Returns): किसी निश्चित भूमि पर श्रम और पूंजी बढ़ाने से उत्पादन बढ़ता है, लेकिन एक सीमा के बाद वृद्धि की दर घटने लगती है।
जनसंख्या वृद्धि: जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ती है, भोजन की मांग बढ़ती है, जिससे कम उर्वर भूमि को भी खेती के लिए इस्तेमाल करना पड़ता है।
भूमि का एक ही प्रयोग सम्भव है : इस सिद्धांत की यह भी मान्यता है कि भूमि का केवल एक ही प्रयोग अर्थात सिर्फ खेती सम्भव । या तो खेती की जाए या भूमि बेकार पड़ी रहे।
भूमि के बाजार में पूर्ण प्रतियोगिता: अर्थात लगान पर भूमि देने वालों और लेने वालों की संख्या बहुत अधिक है।
सिद्धांत की व्याख्या:
रिकार्डो के अनुसार, लगान वह भुगतान है जो भूमि की प्राकृतिक उत्पादकता या उर्वरता के कारण मालिक को मिलता है। यह लाभ उस अंतर से उत्पन्न होता है जो सबसे अच्छी (उच्च उर्वर) और सबसे खराब (सीमांत) भूमि की उत्पादकता के बीच होता है। रिकार्डों ने सबसे पहले बताया कि लगान क्यों उत्पन्न होता और इसकी कितनी मात्रा होती है। रिकार्डों के अनुसार लगान दो प्रकार का होता है । (१) दुर्लभता का लगान : यदि भूमि के गुण में समरूपता या एकरूपता हो पर मांग की तुलना में उसकी पूर्ति सीमित हो तो पूर्ति की सीमितता के कारण जो लगान उत्पन्न होगा वह दुर्लभता का लगान कहलाएगा। दुर्लभता का लगान वह भुगतान है जो भूमि या किसी अन्य प्राकृतिक संसाधन के मालिक को तब मिलता है जब उस संसाधन की आपूर्ति मांग की तुलना में बहुत कम होती है। रिकार्डो के सिद्धांत में, यह विचार इस तथ्य से उत्पन्न होता है कि भूमि की मात्रा स्थिर और सीमित है, जबकि जनसंख्या और भोजन (या अन्य संसाधनों) की मांग बढ़ती रहती है। इस बढ़ती मांग के कारण भूमि की कीमत और उससे मिलने वाला लगान बढ़ जाता है।
मूल आधार :
भूमि की सीमित आपूर्ति: भूमि एक प्राकृतिक संसाधन है जिसे बढ़ाया नहीं जा सकता। इसकी कुल मात्रा निश्चित है।बढ़ती मांग: जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ती है, भोजन, आवास और अन्य जरूरतों के लिए भूमि की मांग बढ़ती है।उत्पादकता में अंतर: सभी भूमियाँ समान रूप से उत्पादक नहीं होतीं, लेकिन दुर्लभता का लगान केवल उत्पादकता से नहीं, बल्कि उपलब्धता की कमी से भी उत्पन्न होता है।
सीमांत भूमि की अवधारणा:
रिकार्डो ने “सीमांत भूमि” की अवधारणा दी, जो वह सबसे निम्न गुणवत्ता वाली जमीन है जिस पर खेती करना अभी भी लाभकारी है। इस भूमि पर कोई लगान नहीं मिलता, क्योंकि यहाँ उत्पादन लागत और बिक्री मूल्य बराबर होते हैं।
व्याख्या :
जब मांग आपूर्ति से अधिक हो जाती है, तो भूमि का मूल्य बढ़ता है, भले ही वह कम उत्पादक हो। इस स्थिति में, यहाँ तक कि “सीमांत भूमि” (जो सामान्यतः लगान नहीं देती) भी लगान उत्पन्न कर सकती है, क्योंकि उसकी दुर्लभता उसे मूल्यवान बनाती है। रिकार्डो के सिद्धांत में, सामान्य रूप से लगान उच्च उर्वर भूमि और सीमांत भूमि की उत्पादकता के अंतर से आता है (भेदात्मक लगान), लेकिन जब सभी भूमियाँ उपयोग में आ जाती हैं और मांग अभी भी बनी रहती है, तो दुर्लभता के कारण लगान उत्पन्न होता है। इसे “दुर्लभता का लगान” कहते हैं।
उदाहरण : मान लीजिए एक क्षेत्र में केवल 100 हेक्टेयर जमीन उपलब्ध है, और भोजन की मांग इतनी बढ़ जाती है कि सारी जमीन खेती के लिए इस्तेमाल हो रही है। अब अगर मांग और बढ़ती है, तो कोई नई जमीन उपलब्ध नहीं होगी। इस स्थिति में, मौजूदा जमीन की कीमत और उससे मिलने वाला लगान बढ़ेगा, भले ही उसकी उर्वरता कम हो। यह अतिरिक्त लगान “दुर्लभता का लगान” है।
आधुनिक संदर्भ में दुर्लभता का लगान आज के समय में शहरी क्षेत्रों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। उदाहरण के लिए : मुंबई जैसे शहर में जमीन की उपलब्धता बहुत सीमित है। बढ़ती जनसंख्या और व्यावसायिक मांग के कारण यहाँ किराया या संपत्ति की कीमतें बहुत अधिक हैं। यहाँ का अतिरिक्त किराया “दुर्लभता का लगान” है, जो जमीन की कमी से उत्पन्न होता है, न कि केवल उसकी उत्पादकता से।गणितीय रूप से दुर्लभता का लगान = (बाजार मूल्य – उत्पादन लागत) × उपलब्ध भूमि की मात्रा
जब मांग आपूर्ति से अधिक हो, तो बाजार मूल्य बढ़ता है, और यह अंतर दुर्लभता के कारण लगान बन जाता है।
(२)भेदात्मक लगान: यदि भूमि के विभिन्न टुकड़ों के गुणों में भिन्नता हो अर्थात उर्वरा शक्ति में भिन्नता हो या उनकी स्थिति में भिन्नता हो पर उत्तम कोटि की भूमि की पूर्ति उसकी मांग की तुलना में कम है तो गुण की भिन्नता तथा लाभ की पूर्ति की सीमितता के कारण जो लगान उत्पन्न होगा वह भेदात्मक लगान कहलाएगा। भेदात्मक लगान” (Differential Rent) वह अतिरिक्त आय या अधिशेष है जो किसी भूमि के मालिक को उसकी भूमि की उच्च उत्पादकता या बेहतर स्थिति के कारण मिलता है, जब इसे सबसे कम उत्पादक (सीमांत) भूमि की तुलना में देखा जाता है। यह अवधारणा डेविड रिकार्डो के लगान सिद्धांत का मूल हिस्सा है। रिकार्डो ने इसे दो संदर्भों में समझाया: उर्वरता का अंतर और स्थान का अंतर।
1. उर्वरता के आधार पर भेदात्मक लगान अवधारणा: अलग-अलग भूमियों की उर्वरता में अंतर के कारण उत्पादन में जो अतिरिक्त उपज मिलती है, वह भेदात्मक लगान बनाती है। सबसे कम उर्वर (सीमांत) भूमि पर कोई लगान नहीं मिलता, क्योंकि वहाँ उत्पादन लागत और आय बराबर होती है। लेकिन अधिक उर्वर भूमि पर कम लागत में अधिक उत्पादन होता है, और यह अंतर लगान के रूप में मालिक को मिलता है।
उदाहरण: मान लीजिए दो खेत हैं:
खेत A (उच्च उर्वर): 100 क्विंटल गेहूँ, लागत ₹10,000
खेत B (सीमांत): 60 क्विंटल गेहूँ, लागत ₹10,000
अब यदि बाजार मूल्य ₹200/क्विंटल तय होता है
(सीमांत भूमि के आधार पर) खेत A की आय = ₹20,000 जिसमें लगान = ₹20,000 – ₹10,000 = ₹10,000
खेत B की आय = ₹12,000 और इसमें लगान = ₹0
यह ₹10,000 का अंतर “भेदात्मक लगान” है।
2. स्थान के आधार पर भेदात्मक लगान अवधारणा: यदि कोई भूमि बाजार या परिवहन सुविधाओं के करीब है, तो उसकी उत्पादन लागत कम होती है (परिवहन पर कम खर्च), जिससे मालिक को अतिरिक्त लाभ मिलता है। यह भी भेदात्मक लगान का हिस्सा है।
उदाहरण: एक खेत शहर के पास है और दूसरा दूर। दोनों की उर्वरता समान (60 क्विंटल) है, लेकिन दूर वाले खेत की परिवहन लागत ₹2,000 अतिरिक्त है। इसका मतलब है कि नजदीकी खेत का मालिक ₹2,000 का भेदात्मक लगान कमाता है।
भेदात्मक लगान की विशेषताएँ:
प्राकृतिक गुणों पर आधारित: यह भूमि की प्राकृतिक उर्वरता या स्थिति से उत्पन्न होता है, न कि मालिक के प्रयास से।
मांग और आपूर्ति से प्रभावित: जैसे-जैसे मांग बढ़ती है और कम उत्पादक भूमि का उपयोग शुरू होता है, भेदात्मक लगान बढ़ता है।
रिकार्डो ने कहा कि लगान इसलिए नहीं मिलता कि भूमि की कीमत अधिक है, बल्कि इसलिए कि भूमि की उत्पादकता में अंतर है। यह अंतर “भेदात्मक लगान” कहलाता है।
इसे दो प्रकारों में बाँटा जा सकता है: (१)विस्तृत मार्जिन (Extensive Margin): जब नई, कम उर्वर भूमि को खेती में लाया जाता है। (२)गहन मार्जिन (Intensive Margin): जब एक ही भूमि पर अधिक श्रम और पूंजी लगाकर उत्पादन बढ़ाया जाता है, लेकिन घटते प्रतिफल के कारण लागत बढ़ती है।
आधुनिक संदर्भ में आज भेदात्मक लगान की अवधारणा केवल कृषि तक सीमित नहीं है। शहरी क्षेत्रों में भी यह लागू होती है, जहाँ बेहतर स्थान (जैसे शहर के केंद्र में जमीन) के कारण अधिक किराया या लाभ मिलता है।
उपरोक्त दोनों प्रकार के लगानों के मूल में ” पूर्ति की सीमितता” है इस पर ध्यान दीजिएगा।
भेदात्मक के लगान और दुर्लभता के लगान में अंतर:
भेदात्मक लगान भूमि की उर्वरता या स्थिति (स्थान) के अंतर से उत्पन्न होता है। यह तब होता है जब बेहतर भूमि की तुलना सीमांत भूमि से की जाती है। जबकि दुर्लभता का लगान तब उत्पन्न होता है जब भूमि की कुल आपूर्ति इतनी कम हो जाती है कि मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त भूमि उपलब्ध नहीं रहती। यहाँ उत्पादकता से ज्यादा आपूर्ति की कमी महत्वपूर्ण होती है।
आलोचनाएँ :
भूमि की उर्वरता स्थिर नहीं: आधुनिक तकनीक (जैसे उर्वरक) से उर्वरता बदली जा सकती है, जो रिकार्डो ने नजरअंदाज किया।
सीमांत भूमि का अभाव: हर जगह सीमांत भूमि का उपयोग जरूरी नहीं होता।
केवल कृषि पर केंद्रित: यह सिद्धांत शहरी भूमि या औद्योगिक उपयोग को नहीं समझाता।
निष्कर्ष :रिकार्डो का लगान सिद्धांत यह दर्शाता है कि लगान भूमि की प्राकृतिक उत्पादकता और मांग-आपूर्ति के अंतर का परिणाम है। यह उस समय के कृषि-प्रधान समाज को समझने में उपयोगी था और आज भी अर्थशास्त्र में एक आधारभूत सिद्धांत माना जाता है।